अरुणाचल कीवी को मिलेगी नई पहचान

 

अरुणाचल कीवी को मिलेगी नई पहचान, ₹167 करोड़ के मिशन से किसानों और निर्यात को बढ़ावा

अरुणाचल कीवी को मिलेगी नई पहचान, ₹167 करोड़ के मिशन से किसानों और निर्यात को बढ़ावा

भारत के उत्तर-पूर्व में पैदा होने वाली कई कृषि उपज अब देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। इसी कड़ी में अरुणाचल प्रदेश की कीवी को प्रीमियम कृषि उत्पाद के रूप में स्थापित करने के लिए एक बड़ी पहल शुरू की गई है।

उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) ने ‘अरुणाचल कीवी: द यूनिक सेलिंग प्रपोज़िशन ऑफ अरुणाचल प्रदेश’ नाम से एक विशेष मिशन शुरू किया है। इस पहल का मकसद अरुणाचल प्रदेश को भारत के प्रमुख जैविक कीवी उत्पादन और निर्यात केंद्र के रूप में विकसित करना है।

₹167 करोड़ की योजना, कई संस्थाएं मिलकर करेंगी काम

इस मिशन के लिए करीब ₹167 करोड़ का परिव्यय रखा गया है। खास बात यह है कि इसे किसी एक विभाग तक सीमित नहीं रखा गया है। अलग-अलग सरकारी मंत्रालयों, संस्थानों और निजी क्षेत्र को साथ लाकर काम करने की योजना बनाई गई है।

यह पहल ‘विकसित उत्तर-पूर्व’ की सोच से जुड़ी हुई है और ‘One State-One USP’ मॉडल का हिस्सा है। इसके तहत उत्तर-पूर्व के राज्यों के उन खास उत्पादों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, जिनमें देश और विदेश के बाजारों में बड़ी संभावनाएं हैं।

इसी मॉडल में मेघालय की लकडोंग हल्दी, नगालैंड की कॉफी, मिजोरम का अदरक और असम का मूगा सिल्क जैसे उत्पाद भी शामिल हैं।

किसानों के सामने आने वाली परेशानियों पर रहेगा फोकस

अरुणाचल प्रदेश में कीवी उत्पादन की अच्छी क्षमता होने के बावजूद किसानों को कई स्तरों पर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उत्पादन के बाद उचित भंडारण और परिवहन की सुविधा नहीं होने से किसानों को कई बार कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है।

नई योजना में इन्हीं समस्याओं को दूर करने की कोशिश की जाएगी। बेहतर कोल्ड-चेन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

जैविक उत्पादन के लिए जरूरी NPOP प्रमाणन से जुड़ी चुनौतियों को भी दूर करने की योजना है। इससे किसानों को प्रमाणित जैविक कीवी के लिए बेहतर बाजार और संभावित रूप से बेहतर मूल्य मिलने का रास्ता खुल सकता है।

अलग-अलग क्षेत्रों में बनाए जाएंगे पोस्ट-हार्वेस्ट हब

मिशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसका क्लस्टर आधारित मॉडल शामिल है। इसके तहत ज़ीरो वैली, दिरांग, कलाकटांग, शि योमी और दिबांग वैली जैसे प्रमुख कीवी उत्पादक क्षेत्रों में छह एकीकृत पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट हब विकसित किए जाने हैं।

इन केंद्रों पर फसल की छंटाई, ग्रेडिंग, पैकिंग, भंडारण और अन्य फसलोत्तर गतिविधियों को बेहतर तरीके से संभालने की व्यवस्था होगी।

इसका सीधा फायदा यह हो सकता है कि खेत से बाजार तक पहुंचने के दौरान कीवी की गुणवत्ता कम न हो और खराब होने वाली मात्रा में भी कमी आए।

2,000 मीट्रिक टन की कोल्ड-चेन क्षमता का लक्ष्य

मिशन के तहत करीब 2,000 मीट्रिक टन कोल्ड-चेन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। कीवी जैसे जल्दी खराब होने वाले फल के लिए यह व्यवस्था काफी महत्वपूर्ण है।

अगर किसान अपनी फसल को कुछ समय तक सुरक्षित तरीके से रख सकें, तो उन्हें तत्काल बिक्री के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। इससे बाजार की स्थिति के अनुसार बिक्री करने का अवसर मिल सकता है।

योजना में केवल उत्पादन बढ़ाने के बजाय मूल्य संवर्द्धन और बाजार एकीकरण पर भी जोर दिया गया है।

अरुणाचल कीवी के लिए विदेशी बाजारों में अवसर

अरुणाचल प्रदेश की कीवी फसल का एक बड़ा फायदा इसकी उत्पादन अवधि है। यहां कीवी की फसल आमतौर पर नवंबर से जनवरी के बीच आती है। यह अवधि न्यूजीलैंड के कीवी ऑफ-सीजन के साथ मेल खाती है।

यही कारण है कि दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप और मध्य-पूर्व जैसे बाजारों में अरुणाचल कीवी के लिए अवसर देखे जा रहे हैं।

अगर उत्पादन के साथ गुणवत्ता, प्रमाणन, पैकेजिंग और निर्यात व्यवस्था को मजबूत किया जाता है, तो अरुणाचल कीवी अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक अलग पहचान बना सकती है।

भारत के कीवी उत्पादन में अरुणाचल की बड़ी हिस्सेदारी

अरुणाचल प्रदेश देश के सबसे महत्वपूर्ण कीवी उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है और भारत के कुल कीवी उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक बताई जाती है।

राज्य को जैविक कीवी प्रमाणन हासिल करने वाले देश के पहले राज्यों में विशेष स्थान प्राप्त है। ऐसे में जैविक उत्पादन और प्राकृतिक परिस्थितियों को इसकी सबसे बड़ी ताकत के रूप में पेश किया जा सकता है।

किसानों की आय बढ़ाने की कोशिश

इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू किसानों की आमदनी से जुड़ा है। केवल ज्यादा उत्पादन करना ही पर्याप्त नहीं है। किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले, फसल खराब न हो और उसे बड़े बाजारों तक पहुंच मिले—इन सभी पहलुओं पर एक साथ काम करना जरूरी है।

मिशन के तहत अभिसरण, मूल्य संवर्द्धन, ब्रांडिंग और बाजार एकीकरण को चार प्रमुख आधार बनाया गया है। इससे अरुणाचल कीवी को केवल स्थानीय फल के बजाय एक ब्रांडेड प्रीमियम उत्पाद के रूप में विकसित करने की कोशिश होगी।

आगे क्या बदल सकता है?

अगर यह योजना अपने लक्ष्य के अनुसार आगे बढ़ती है, तो इसका असर केवल कीवी उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। बेहतर कोल्ड-चेन, प्रसंस्करण और निर्यात सुविधाओं से उत्तर-पूर्व के अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी नए रास्ते खुल सकते हैं।

अरुणाचल प्रदेश के किसानों के लिए सबसे बड़ा अवसर यह होगा कि उनकी उपज सीधे बड़े और प्रीमियम बाजारों से जुड़ सके। वहीं उपभोक्ताओं के लिए प्रमाणित और बेहतर गुणवत्ता वाली ‘अरुणाचल ऑर्गेनिक कीवी’ एक नए भारतीय कृषि ब्रांड के रूप में सामने आ सकती है।

कुल मिलाकर, ₹167 करोड़ की यह पहल अरुणाचल प्रदेश की कीवी खेती को पारंपरिक उत्पादन से निकालकर ब्रांडिंग, वैल्यू एडिशन और निर्यात आधारित कृषि कारोबार की दिशा में ले जाने की कोशिश है। आने वाले समय में इस मिशन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों तक सुविधाएं कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती हैं और अरुणाचल कीवी को घरेलू व वैश्विक बाजार में कितनी मजबूत पहचान मिलती है।

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